आयोग एक नज़र में > कल्याण कार्यक्रम

छत्तीसगढ़ शासन की अधिसूचना क्रमांक- 186/2000 एवं वर्ष 2000 द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य में अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन किया गया है।

 

अनुसूचित जाति/जनजाति के कल्याण कार्यक्रम

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अनुसूचित जाति/जनजाति के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक स्वास्थ्य विकास के लिये राज्य स्तर पर कई कार्यक्रम संचालित किये जाते है ं संचालित कार्यक्रमों की समय- समय पर आयोग द्वारा जिला स्तर पर या विकासखण्ड स्तर पर समीक्षा की जाती है । स्थल पर जाकर निरीक्षण किया जाता है और योजनाओं के बेहतरी के लिये शासन को सुझाव भी दिेये जाते है ।

कोई भी समाज कितना लोकतांत्रिक है यह उस समाज के भीतर होने वाली बहस के तरीके और स्तर से पता चलता है । साथ ही समाज की यह जिम्मेदारी है कि वह समाज में ऐसे संस्थाओं व प्रक्रिया को स्थापित करें ताकि लोग अपने विचार ओर भावनाओं को न केवल समाज के सामने रख सकें । बल्कि जरूरत के हिसाब से उस पर सवाल कर सकें । इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोगों की क्षमता इस प्रकार बढाई जाये ताकि वे समाज में संवाद बढाने की प्रक्रिया में लगी संस्थाओं तक पहूंच कर अपनी बात रख सके । लोग जिस तरह से विषयों पर भी चर्चा करके अपनी बात रखते है, और बहस करते है वहीं प्रक्रिया भी लोगों की भागीदारी व दुनिया को दिखाई देने वाला प्रमाणिक स्वरूप है । अत: अगर सहभागिता एक विचार हेै तो बहस व संवाद उसका व्यवहारिक स्वरूप है । समाज के भीतर चलने वाली बहस समुदाय और व्यक्ति दोनों स्तरों पर किया जाना जरूरी है । आयोग समुदाय के भीतर इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने वाली संस्थागत संरचना है और आयोग ने अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यवस्था एवं हित संरक्षण में काम करना तय किया है :-

 

1. समुदाय के साथ रह कर काम करना ।
2. समुदाय के पंचायत के वैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया पर समझ मजबूत करना ।
3. सामाजिक बदलाव एवं आर्थिक विकास से जुड़े मुददे में संवाद को बढ़ाना ।
4. इस प्रकिया में समाज के सभी वर्गो को शामिल करना ।

छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के आधारभूत समस्याओं एवं व्यवहारिक कठिनाई को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय संविधान के अनुसार प्राप्त संवैधानिक प्रावधानों में निहित संरक्षण में कार्य की प्राथमिकता दिया है तथा संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत दी जाने वाली सुविधाओं को इस वर्ग के अंतिम छोर तक पहुंचाने एवं समस्याओं को सहज एवं सुलभ रूप से सुनने का मंच प्रदाय किया है ।

छत्तीसगढ़ में लगभग 42 जनजातियां एवं उपसमूह विभिन्न भागों में निवास करती है । राज्य में इनका वितरण समान रूप से नहीं है । प्रत्येक जनजाति की अपनी प्रजाति, भाषा, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विशेषताएं है । जनजातियों की सहजता अनुभव युक्त, छल कपट एवं जीवन विकास के विकारों से सर्वथा मुक्त है । भले ही उनमें शिक्षा का आभाव है । इनके जीवन पध्दति एवं समाजिक मर्यादा विशिष्ट, इनके रीति- रिवाज, आचार- विचार वैवाहिक रहन- सहन, जन्म मृत्यु, अध्ययन के लिए प्रेरित करते है ।

picture समय समय पर भारत में विभिन्न समुदाय प्रवेश करते रहे है । लेकिन कालान्तर में ऐसे सभी समूहों की सांस्कृति परम्पराओं भारतीय समाज का अंग बन गई । इसके पश्चात भी अनेक मानव समूह ऐसे भी है । जिन्होंने बाह्य सभ्यता के कुछ तथ्यों को ग्रहण करने के पश्चात भी अपनी मौलिक सांस्कृतिक विशेषताओं को नष्ट नहीं होने दिया । साधारणत: ऐसे समूह को भी हम जनजाति के नाम से संबोधित करते है । ये जनजातियां प्राय: शहरी सभ्यता से बहूत दूर गहन जंगलों के अंधेरे कोने में पर्वत के गंगनचुंबी चोटियो ंपर एवं उनकी तलहटियों में, पठारी क्षेत्रों में निवास करती है और प्रत्येक अर्थ में अत्यधिक पिछड़ी हुई है। यही कारण है कि इनको आदिम तथा तथा कथित खानाबदोश मानकर लंबे समय तक अवहेलना की जाती रही है । समान्यत: लोग जनजाति का तात्पर्य आदिवासी पिछड़े हुये असभ्य मानव समूह से समझते है जो कि एक सामान्य क्षेत्र में रहते हुए एक सामान्य भाषा बोलते है । और सामूहिक संस्कृति को प्रयोग में लाते है ।

संविधान के अनुच्छेद- 366 (25) के अनुसार अनुसूचित जनजाति का तात्पर्य वे जनजातियां अथवा इस प्रकार की जनजातियां अथवा जनजाति समुदायों के अंशो अथवा समूहों से है जो कि संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजातियों के रूप में माने गये है ।

संविधान के अनुच्छेद- 245 के तहत राष्ट्रपति के द्वारा आम सूचना के तहत अनुसूचित जनजाति को उल्लेखित किया जा सकता है ।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 342 के तहत अनुसूचित जनजातियों के रूप में अधिसूचितों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिये अधिनियम एवं कानून बनाये गये है । उन प्रावधानिक किये गये कानूनों के अनुकूल आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक विकास के कार्य हो रहे है अथवा नहीं । सुरक्षात्मक कार्यवाही आयोग के कार्य क्षेत्र के अंतर्गत है । इसके तहत आयोग अनुसूचित जाति/जनजाति से संबंधित नियम एवं कानूनों के अधीन कार्य करने संबधी समीक्षा करके संरक्षण प्रदान करने का प्रयास है । विगत वर्षों में आयोग द्वारा राज्य शासन को अनुसूचित जाति/जनजाति के हित में सामाजिक, आर्थिक कार्य संबंधी प्रतिवेदन भी सौंपे गये है । उसी प्रकार आयोग द्वारा वर्ष 2003-04 एवं 2004-05 का तृतीय द्विवार्षर्िक प्रतिवेदन तैयार कर महत्वपूर्ण सुझाव सौंपे जा रहे है ।